Wednesday, 26 July 2017

History - महान किसे कहा जाए?

              इतिहासकार डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल(पूर्व प्राध्यापक, इतिहास विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय) शानदार सवाल उठाते हैं। आखिर महान कहलाने की कसौटी क्या है? इनका कहना है,"किसी शासक का मूल्यांकन उसके द्वारा राष्ट्रजीवन के विकास में किये गये प्रयत्नों के रूप में आंका जाना चाहिए। उसकी मातृभूमि, भक्ति तथा सांस्कृतिक जीवन मूल्यों की स्थापना में उसके योगदान से की जानी चाहिए। उसके धर्म संरक्षण तथा जनकल्याण के कार्यों से आंकी जाना चाहिए।"

              अत: सम्राट अकबर तथा महाराणा प्रताप का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होगा। ऐसे भी तब जब इतिहास लेखन का नया दौर चल रहा हो। राजस्थान बोर्ड की 10वीं क्लास की किताब के मुताबिक,''हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर ने महाराणा प्रताप को हराया था।''

इससे पहले कुछ वामपंथी इतिहासकारों के वक्तव्य को देख लेना जरूरी होगा।

                भारतीय कम्युनिस्ट लेखकों ने मुगल साम्राज्य को भारत का शानदार युग तथा मुगल शासकों को महान मुगल कहा है (विपिन चन्द्र- मॉडर्न इण्डिया, पृ. 11) इससे भी एक कदम और बढ़कर इसे भारत में स्थापित राष्ट्रीय राज्य अथवा भारतीय राष्ट्रवाद की तुलना में राष्ट्रीय शासक थे (रोमिला थापर, हरवंस मुखिया तथा विपिन चन्द्र, कम्युनलिज्म एण्ड द राइटिंग्स आफ इंडियन हिस्ट्री, पृ. 58-60)।

                 भारतीय कम्युनिस्ट लेखकों तथा तथाकथित सेकुलरवादियों ने महाराण प्रताप को केवल दिल्ली सम्राट के संदर्भ में ही देखने का प्रयत्न किया या मेवाड़ के राजाओं की श्रृंखला की एक कड़ी माना। उन्होंने राणा प्रताप का प्रभाव सीमित श्रेत्र तक ही बतलाया।

                  वस्तुत: मुगल शासक की तुलना करते हुए, महाराणा प्रताप से श्रेष्ठ इसे बतलाते हुए, एक झूठे प्रचारतंत्र तथा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अवसरवादिता ही कहा जा सकता है, परन्तु इतिहास के पाठकों को इस प्रचार के प्रमाण रहित तथ्यों के आधार पर ज्यादा देर तक भ्रमित नहीं किया जा सकता।

                  हद तो तब हो गई जब कांग्रेस सरकार के काल में प्रकाशित कक्षा छह से कक्षा बारह तक की सभी इतिहास की पुस्तकों में एनसीईआरटी द्वारा महाराणा प्रताप को इतिहास से निष्कासित कर दिया गया। उसका नाम भी इतिहास की पुस्तकों में नहीं है। साथ ही श्याम नारायण पाण्डे की पुस्तक हल्दीघाटी के पदों को पुस्तको से निकाल दिया गया। ऐसी क्षुद्र मानसिकता क्या कभी किसी देश में अपने देश के वीरों के संदर्भ में मिलेगी? कदापि नहीं।

अकबर महान कैसे?

                 वास्तव में अकबर का प्रवृत्ति साम्राज्यवादी था। सम्राट अकबर मुगल वंश का तीसरा शासक था जिसने 1956-1605 ई. तक अर्थात लगभग पचास वर्ष राज्य किया था। पहले दो शासकों की भांति वह भी विदेशी था। उसकी रगों में भारतीय रक्त की एक बूंद भी न थी (वी.ए. स्मिथ, अकबर द ग्रेट मुगल, पृ.1) वह अफीम मिली शराब का व्यसनी था।

                  नशे में इतना धुत हो जाता था कि मेहमान से बातें करते-करते सो जाता था (विवियन, अकबर पृ.16) उसमें महिला विषयक सभी बातें थीं। अबुल फजल के अनुसार उसके हरम में 3000 महिलाएं थीं (अबुल फजल, अकबरनामा) सम्राट अकबर का जीवन-दर्शन तथा दैनिक क्रियाकलाप एक विदेशी साम्राज्यवादी तथा कट्टर मुसलमान के समान थे।

महान महाराणा प्रताप और उनका चरित्र

                   उन्हें मिला मेवाड़ राज्य के नाम पर केवल 450 वर्ग किमी. परिधि वाला छोटा सा पर्वतीय भूभाग, प्राचीन मेवाड़ की गौरवमयी कुल परंपरा तथा 1568 में अकबर द्वारा चित्तौड़ का ध्वंस, जौहर तथा तीस हजार राजपूतों के नरसंहार की स्मृतियां।

                   उसके सम्मुख दो विकल्प थे- साम्राज्यवादी क्रूर तथा चालाक सम्राट अकबर की अधीनता अथवा भारत की स्वाधीनता के लिए विदेशी अकबर से अनवरत संघर्ष। प्रताप ने दूसरा मार्ग चुना।

                    नि:संदेह महारणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध अपनी स्वाधीनता की रक्षार्थ आजीवन संघर्ष ने भारत के राष्ट्रीय चरित्र को शक्ति तथा उच्चता प्रदान की। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा प्रताप के अकबर महान के विरुद्ध सफल संघर्ष के कारण भारतवर्ष की प्रधान तात्विक भावना का प्रतीक माना गया है जो सर्वथा उचित है। यह भावना देश के परंपरागत गौरव की रक्षा करती है और इस गौरव पर आंच लाने वाली हर बात के विरुद्ध संघर्ष करती है।

प्रताप से प्रेरणा

                     संकट की बेला में महाराणा प्रताप ने अद्भुत धैर्य, क्षमता तथा शौर्य का परिचय दिया। उन्होंने भीलों तथा अन्य जनजातियों को समरसता, सहयोग से संगठित कर उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ दिया, जो आज भी राष्ट्रीय कर्णधारों के लिए बेजोड़ मिसाल है।

                      सम्राट अकबर ने अपने स्वभाव के विपरीत महाराणा प्रताप पर तुरंत आक्रमण नहीं किया। पहले उसने मेवाड़ के चारों ओर के क्षेत्रों पर महाराणा प्रताप के संबंधियों को शासक बनाया, जो महाराणा के विरुद्ध थे। मेवाड़ के आसपास मुसलमानों को बसाया। एक-एक करके चार बार अकबर ने अपने दूत प्रताप को अधीनता स्वीकार करने को भेजे, पर सभी असफल रहे।

                      आखिर मानसिंह को प्रताप के विरुद्ध भेजा। राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. के.एस. गुप्ता ने इसका विस्तृत वर्णन किया। मुख्य युद्ध खमनौर के पास रक्त तिलाई में हुआ (यहां स्मृति के रूप में एक विशाल सरोवर बना हुआ है) हल्दीघाटी में भयंकर मारकाट हुई। अबुल फजल ने लिखा, युद्ध में इज्जत महंगी और जान सस्ती थी। युद्ध में महाराणा प्रताप को भारी सफलता मिली तथा मुगल सेना को भागना पड़ा। हल्दीघाटी का यह युद्ध भारत के इतिहास की अमर गाथा है।

हल्दीघाटी का युद्ध और दोबारा इतिहास लेखन!

                    इसी युद्ध के संबंध में पीटीआई के अनुसार सोशल साइंस की एक नई किताब को 2017-18 में राजस्थानी छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस किताब के इस चैप्टर को लिखने वाले चंद्रशेखर शर्मा का दावा है कि ऐसे कई तथ्य हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि लड़ाई के नतीजे महाराणा प्रताप, मेवाड़ के राजपूत राजा के पक्ष में रहे।

शर्मा का दावा कि विजेता राणा प्रताप हैं।

                  शर्मा इन दावों के बारे में कहते हैं, ''ये ऐसे परिदृश्य हैं जो हल्दीघाटी युद्ध के परिणाम प्रताप के पक्ष में लाकर खड़ा कर देते हैं। इनके अनुसार अकबर का लक्ष्य था कि महाराणा प्रताप को पकड़ा जाए और मुगल दरबार में पेश किया जाए या मार दिया जाए। इसका मकसद राजपूत राजा के साम्राज्य को मुगलों के अंतर्गत लाना था। लेकिन अकबर अपने किसी मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाया।

                  ऐसे ऐतिहासिक सबूत हैं कि मुगल सेनाएं मेवाड़ को फ़तह करने में नाकामयाब रहीं और लड़ाई महाराणा प्रताप के पक्ष में रही।''

महाराणा प्रताप प्रेरणा के स्त्रोत न कि अकबर।

                   भारत के इतिहास में महाराणा प्रताप सदैव प्रेरक रहे, अकबर नहीं। वस्तुत: अंग्रेजों के काल में दासता से मुक्ति दिलाने में प्रताप के नाम ने जादू का काम किया था (डॉ. के.एस. गुप्ता, साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतंत्रता का पथ प्रदर्शक मेवाड़) क्रांतिकारी शचीन्द्र सान्याल की अभिनव भारत समिति की सदस्यता के लिए चित्तौड़ जाकर विजय स्तंभ के नीचे शपथ लेने की पहली शर्त थी। सदस्य बनने के पश्चात चितौड़ तीर्थ की यात्रा तथा हल्दी घाटी की माटी का तिलक आवश्यक था।

                    श्यामनारायण पाण्डे ने अपनी प्रसिद्ध काव्य हल्दीघाटी (1949) में प्रताप को भारत का गौरव लिखा। गणेश शंकर विद्यार्थी प्रताप को अपने इष्टदेव के रूप में मानते थे। 9 नवम्बर 1913 को उन्होंने अपनी साप्ताहिक पत्रिका प्रताप को समर्पित करते, पहले अंक में लिखा- संसार के किसी भी देश में तू (राणा प्रताप) होता तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने को न्योछावर करते।

                     अमरीका में होता तो वाशिंगटन या नेल्सन को तेरे आगे झुकना पड़ता। फ्रांस में जॉन ऑफ आर्क तेरी टक्कर में गिनी जाती और इटली तुझे मैजिनी के मुकाबले रखती।' हल्दीघाटी के पश्चात सम्राट अकबर की महाराणा प्रताप से लड़ने की हिम्मत न हुई। इतिहास का कोई भी पाठक स्वयं निर्णय कर सकता है कि क्या भारत की महानता, महाराणा प्रताप की स्वाभिमानपूर्ण तथा राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत स्वराज्य के लिए संघर्ष में थी या साम्राज्यवादी, विदेशी, मतान्ध तथा महत्वाकांक्षी अकबर की कूटनीति में। वस्तुत: सम्राट अकबर के साथ महान शब्द जोड़ना सर्वथा अनुचित तथा तथ्यहीन है। नि:संदेह 'महान' महाराणा प्रताप का जीवन भावी पीढ़ी के लिए सतत् प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।     

पूर्वाग्रहग्रस्त मीडिया की नजर! किस तरह गुमराह किया जा रहा है।

               बीबीसी महाराणा प्रताप की जीत के संबंध में लिखता है,"441 साल बाद महाराणा प्रताप से हारे अकबर!-राजस्थान में इतिहास 360 डिग्री पर घूमता सा नज़र आ रहा है।"

              वहीं इंडियन एक्सप्रेस लिखता है,"Maharana Pratap won Haldighati: varsity accepts MLA proposal."

               इंडिया टुडे का कहना है," Rajasthan rewrites history: Maharana Pratap, not Akbar, won Battle of Haldighati."

                हिंदुस्तान टाइम्स तो एक कदम और आगे बढ़ जाता है,"BJP-ruled states are facing increasing criticism for allegedly re-writing history of India to give it a right-wing perspective: portray Mughals ruler as mass murderers and show Hindu rulers as the victors in major battles. The party is also accused of erasing references of its political adversaries to include people whom it considers national icons."

पर कभी आपने सोचा है कि इसतरह की बातें क्यों की जाती है? और ऐसी रिपोर्टिंग क्यों होने लगती है?

                यदि संघ से संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति है तो उसे सांप्रदायिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है,लेकिन जब कई विद्वानों और इतिहासकारों का संबंध किसी वामपंथी संगठन से हो तो इनका कौमार्य भंग नहीं होता। अजीब विडंबना है देश का। कभी आप भी सोचिए!

                वास्तव में वामपंथी जमात एक कल्पित आत्ममुग्ध भाई-भतीजावादी समूह है। अगर दिल्ली में बैठा कोई वामपंथी कुछ दावा करता है तो केरल और बंगाल के तथाकथित वामपंथी भाई बिना अध्ययन और प्रमाण जुटाए हाँ में हाँ मिलाना शुरू कर देते हैं। इनको अकादमिक दुनिया और शोध से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि ये अपनी एजेंडा को हमेशा फैलाने को प्रयासशील रहते हैं। यह एजेंडा है मुस्लिम तुष्टिकरण का,दलित सहयोग के नाम पर सवर्णों के खिलाफ भड़काना,नारी सशक्तिकरण के नाम पर भारतीय फ्री सेक्स को बढ़ावा देना और भारतीय संस्कृति को पतनोन्मुख बनाना ताकि समाजवादी राज्य की स्थापना कर स्टालिन की भांति लाखों मासूम लोगों की हत्या किया जा सके और अपने आराम की कुर्सी पाकर शैंपेन की बोतल आपस में लड़ाकर कहते रहे हैं कि भारत में असहिष्णुता बढ़ गया है,आपातकाल की आहट सुनाई दे रही है,संविधान खतरे में है...वगैरह....वगैरह....!

आलेख का आधार-

1. इतिहासकार डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल(पूर्व प्राध्यापक, इतिहास विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय) की किताबें
2. विपिन चंद्र और रोमिला थापर की किताब(संदर्भ आलेख में है)
3. पांचजन्य में छपा आलेख
4. बीबीसी हिंदी
5. इंडियन एक्सप्रेस
6. इंडिया टुडे
7.हिंदुस्तान टाइम्स
8. ब्लॉग

Monday, 8 May 2017

International/global issues - फ्रांस में दक्षिणपंथ की हार : एक भिन्न नजरिया!

        आज नहीं बल्कि भारत में मोदी को प्रधानमंत्री उम्मीदवारी मिलने और आम चुनाव में जीत के बाद से सुन रहा हूँ,"बेरोजगारी,आतंकवाद और राष्ट्रवाद आदि वो मुख्य वजहें हैं जो राष्ट्रवाद की उभार में सहायक होती है।" इन वजहों को भारत लोकसभा चुनाव,अमेरिका में ट्रंप की जीत,ब्रिटेन का ईयू से अलग होना और हॉलैंड तथा फ्रांस में दक्षिणपंथी रुझान की बढ़ती लोकप्रियता को आधार मानकर कुछ स्वयंभू पत्रकारों और पूर्वाग्रहग्रस्त इलीट द्वारा प्रमाणित भी कर दिया गया। लेकिन......

         इस सवाल का जवाब देने की जोहमत किसी ने नहीं दिखाई कि अगर दक्षिणपंथ के उभार की वजहें उपर्युक्त साधन है तो वामपंथ के लिए क्या है? यहीं पर संतुलित और निष्पक्ष पत्रकारिता की पोल खुल जाती है।

         कल एक हिंदी चैनल(स्क्रीन काला करने वाला) के प्राइम टाइम का इंट्रो सुनने के बाद ऐसा लगा कि भारत में हिंदी टीवी पत्रकारों के बुद्धि का स्तर क्या है?(1) धारा के साथ सामंजस्य बैठाने की एक कबाड़ प्रवृति का विकास तेजी से ऐसे पत्रकारों में हो चला है। दूसरे का नाम देकर,संदर्भित करके अपने मन की बात को उजागर करने का नायाब तरीका ईजाद कर लिया गया है। खैर.......

         फ्रांस में मैक्रों की जीत भारत के केजरीवाल जैसा तो नहीं!

         कहा जा रहा है कि महज कुछ ही वर्षों में फ्रांस की राजनीति में आये इस बैंकर ने अपने उदार-मध्यमार्गी छवि से अपनी साख बना ली और नेपोलियन के बाद सबसे कम उम्र में फ्रांसीसी गणराज्य के नए शासक के रूप में काबिज हो गए। यह कुछ ऐसा ही हुआ जैसा कुछ साल पहले हम दिल्ली में राजस्व अधिकारी से नेता बने केजरीवाल में देख चुके हैं। दिल्ली तो इस बात की भी गवाही है कि महान सपनों का आंदोलन किसतरह एक धोखा में परिवर्तित होकर रह गया है। फ्रांसीसी गणराज्य को कौन भूल सकता है जहां राब्स्पियर जैसा चरित्र भी पनपा था,जिसने फ्रांस की क्रांति (1789) के ओट में इतना कहर बरपाया था जिसमें उसने सबसे पहले अपने साथियों को निशाना बनाया,फिर खुद बर्बाद हुआ और मारा गया। महान सपनों की क्रांति पहले आतंक और फ़िर तानाशाही में बदली थी।(2)

          इमैनुअल मैक्रों के जीत के कारण!

          मैक्रों को चुनाव में 66.06 फ़ीसदी वोट मिले और उनकी धुर दक्षिणपंथी प्रतिद्वंद्वी मरी ल पेन को 33.94 फ़ीसदी वोटों से ही संतोष करना पड़ा है। इनके जीत के पांच कारण को बीबीसी अपने एक रिपोर्ट में इस प्रकार बताता है-1.किस्मत का कमाल,2.चतुराई,3.फ्रांस में एक नई शुरुआत की,4.सकारात्मक संदेश,5.वो मरी ल पेन के ख़िलाफ़ खड़े थे जिनमें नकारात्मकता झलका रहीं थी। वो अप्रवासन, यूरोपीय संघ और सिस्टम के ख़िलाफ़ खड़ी थीं। (3)

          पर इनके जीत के कारण के मुख्य वजह को नजरअंदाज कर दिया गया जो कई नकारात्मक संदेश धाफ़ं किये हुए है। द हिंदू में छपे एक आलेख में कहा गया है कि मैक्रों के विचारों पर वास्तव में गहराई से चर्चा नहीं किया गया।(4)(5) यहीं वह मुख्य वजह है! इसे नजरअंदाज करना फ्रांस में भी दिल्ली के विधानसभा चुनाव वाली गलती को दोहराना होगा।

          दक्षिणपंथी रुझान वाली मरी ल पेन की उपलब्धि!

          इनकी पार्टी नेशनल फ्रंट की शुरुआत 1972 में छोटे स्तर से हुयी थी। कई वर्षों तक तीखी आलोचना को नजरअंदाज करने के बाद इनको वास्तविक सफलता तब मिली जब यह राष्ट्रीय बहस को प्रभाव डालना शुरू कर दिया। 2002 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में पेन के जीत के उम्मीद को उस समय धक्का लगा जब तथाकथित रिपब्लिकन फ्रंट जो मुख्य धारा के पार्टियों का एक महागठबंधन था इनके खिलाफ लामबंद हो गए।

         पर पंद्रह साल बाद पेन ने उस फ्रंट को नेस्तानाबूद कर डाली और फ्रांस के इतिहास में दक्षिणपंथी रुझान वाले किसी भी संगठन द्वारा 30 प्रतिशत से ज्यादा मत पाकर मुकाम हासिल कर ली और अपने लक्ष्य की तरह एक और कदम बढ़ा दिया। फ्रांस में यह दक्षिणपंथ की हार नहीं बल्कि अमेरिका और भारत के बाद एक ऐसा प्रयोगशाला है है जिसका भविष्य उज्जवलमयी है।(6)

          इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर फिर से लिबरल,लेफ्ट,छद्म सेकुलर और कठमुल्ला जमात हिटलर को विमर्श में वापसी करा दें और दक्षिणपंथ को बदनाम करने का सतही प्रमाणों को पेश करना शुरू कर दे। पर हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इतिहास ने जितना अन्याय हिटलर के साथ किया है उतना किसी भी राष्ट्रावादी के साथ नहीं। खैर....(7)

         इसलिए आप सावधान हो जाइये! राष्ट्रवाद समाज और व्यक्ति की आत्मा है और दक्षिणपंथ आपके भावनाओं का क़द्र करता है। भले ही चुनावी राजनीति में सीटों के लिहाज से यह पिछड़ता नजर आये लेकिन हर शख्स के दिलो-दिमाग पर यह राज करता है और साथ ही अपनी उपस्थिति हर जगह दर्ज कराता है!

संदर्भ -

1. NDTV प्राइम टाइम का इंट्रो
2. ब्लॉग
3. बीबीसी हिंदी
4. द हिंदू
5. द हिंदू(the centre holds)
6. Same
7. ब्लॉग
8. The guardian

Thursday, 4 May 2017

My diary - मोरल पुलसिंग अवश्यंभावी नजर आ रहा है!

ऐश्वर्या राय,सलमान खान और अजय देवगन की एक फिल्म का संवाद कि ये तो साबित हो गया कि ये सीढियां नीचे से ऊपर जाती है लेकिन इससे यह मालूम नहीं चलता कि यहीं सीढियां ऊपर से नीचे भी आती है! यह वकालती तर्क नहीं बल्कि कुतर्क था जिसे स्वीकार कभी भी नहीं किया जा सकता। सार्वभौमिक वक्तव्यों और तथ्यों को शब्दों के जाल में उलझाया नहीं जा सकता।

माहौल में तेजी से परिवर्तन आ रहा है और प्यार तथा आजादी के नाम पर अश्लीलता का नंगा नाच किया जा रहा है। पटना का 'इको पार्क' तो अभी उस अधोगति को नहीं पाया है जितना दिल्ली में मेट्रो स्टेशनों और कनॉट प्लेस स्थित सेंट्रल पार्क या अन्य पार्कों में देखने को मिल जाता है।

अभी मैं दिल्ली के सेंट्रल पार्क में अकेले दोपहर में एक छोटे पेड़ के छाँव में बमुश्किल पांच मिनट ही बैठा होगा कि एक लगभग बदसूरत सी दिखने वाली ठिगनी लड़की एक अपने से लंबे लड़के के साथ मेरे साथ लगे पेड़ की छाँव में बैठ गयी। मिनट भी नहीं गुजरा होगा,शर्म का कोई भाव तो था ही नहीं,बेहयाई तो चरम पर था-लड़का लड़की के पैरों पर सर करके लेट जाता है और लड़की उसके शरीर पर झुक जाती है-सभी के सामने ही वे निर्लज्जता उदाहरण पेश करने लगते हैं। कपड़े के ऊपर से ही चरित्रहीन लड़का उस चरित्रहीन लड़की के स्तन को मुंह में लेकर सारी हदें पार कर देता है। कई जन वहाँ से गुजरते रहते हैं लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता है और अंत में मुझे ही वहाँ से बाहर निकलना पड़ता है।

मुझे ताज्जूब तब होती है जब मैं देखता हूँ कि ऐसे घिनौने काम करने वालों में वह अकेला नहीं था बल्कि कई जोड़े इस काम में मशगूल थे और अपने परिवार और समाज की इज्जत का धज्जियाँ उड़ा रहे थे। पीछे में अपने माता-पिता को शर्मसार कर रहे थे और पश्चिमीकरण का आधुनिकता के रूप में सांकेतिक बखान कर सांस्कृतिक पतन का मिसाल पेश कर रहे थे।

जाहिर है ऐसे उदाहरण न केवल भारत के पतन का नींव खोद रहे हैं बल्कि नैतिकता रूपी महानता को भी धता बता रहे हैं!

"क्या 'मनमर्जी','स्वेक्षा','आजादी' और प्यार के नाम पर किसी भी परिप्रेक्ष्य और नजरिये से सही ठहराया जा सकता है?"

"नहीं!"

तो नारी अधिकारों की बात करने वाले क्यों नहीं पनप रही इस सड़ांध भरी मानसिकता के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं? सामाजिक कार्यकर्त्ता वास्तव में कर क्या रहे हैं? ये सामने क्यों नहीं आते जब इनकी असल में जरुरत होती है? क्या 'एंटी रोमियो स्क्वार्ड' की जरूरत दिल्ली और अन्य शहरों में भी महसूस हो रही है?

जवाब बिल्कुल 'हाँ' है क्योंकि सिविल सोसाइटी अपना काम अच्छा से नहीं कर रहा है तो क़ानून में बदौलत समाज के पतन को रोका जा सकता है। नैतिकता स्थापित की जा सकती है।

यह सब केवल और केवल एक ही तरीके से होगा और वह है - 'मोरल पुलसिंग'।

मोरल पुलसिंग को भारत में नैतिकता को लागू करने के संबंध परिभाषित किया जाता है। यह अनैतिक कार्यों और भारतीय संस्कृति के खिलाफ किये गए हरकत को निशाना बनाता है। पार्क में यहीं सब तो किया जा रहा है।

आप तय कर लें कि क्या ऐसे हरकतों को कभी भारत जैसे पवित्र भूमि पर स्वीकार किया जा सकता है? सभी की अपनी एक सीमा है। सभी प्रकार के कार्यों के लिए भारत में समय और नियत स्थान तय किये गए हैं तो हम आखिर क्यों अपने मूल्यों को भूलते जा रहे हैं?

कारण एक नहीं अनेक है लेकिन इसमें सबसे महत्वपूर्ण कारण 'व्यक्ति की परवरिश' की है। आपकी हरकतें वास्तव में बता देती है कि आप किस समाज से उठकर आये हैं और और आपके पारिवारिक मूल्यों का स्तर क्या है? भले ही कुछ अपवाद हो सकते हैं लेकिन मूल्य विकास एक अहम किरदार अदा करता है।

इसलिए हमें बहस मूल्य विकास,नैतिक उत्थान और सांस्कृतिक रक्षा जैसे साधनों पर करना चाहिए जिससे व्यक्ति के साध्य को आसानी से पाया जा सके!

संदेश साफ़ है कि हम संकट में जकड़ते जा रहे हैं - सांस्कृतिक संकट की जकड़न!