Monday, 31 July 2017

Political commentary - महागठबंधन टूटने का मुख्य वजह - गरिमा का टकराव!

              भाजपा-जदयू गठबंधन पर विश्लेषण की विद्वता की तो बाढ़ आ गयी है! पर सियासी पंडितों के लिए बिहार की राजनीति समझना उतना भी आसान नहीं रहा है। नीतीश कुमार बिहार की राजनीति में सर्वमान्य राजनीतिक नेता कभी नहीं रहे जिसका प्रमाण हम गठबंधन के उनके सरकार के रूप में देखते रहे हैं। वे NDA का हिस्सा रहकर ही सत्ता भोग करते रहे और जब इससे अलग होकर दोबारा सत्ता में आये तो वो भी अपने बदौलत नहीं बल्कि इसके केंद्र में महागठबंधन था। आज फिर से उनकी 'घर वापसी' हो गई है। इस शब्द को मीडिया द्वारा या कुछ लोगों द्वारा एक सार्थक राजनीतिक विश्लेषण के सूखापन के कारण गढ़ा गया। जिसका कोई मतलब नहीं है बल्कि इसका ढंग मजाकिया ही है।

              अगर आप मीडिया के हेडलाइन्स पढ़ेंगे तो ताज्जूब हो जाएंगे कि कैसे-कैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जा रहा है। मसलन 'नीतीश कुमार पलटी मारने में चैंपियन हैं','नीतीश का ह्रदय परिवर्तन','नीतीश का घर वापसी','सत्ता का भूख' वगैरह....वगैरह...!

               पर हैरानी तब होती है जब ऐसी बातों को मेन स्ट्रीम मीडिया अपने लेखों में जगह देती है और गंभीरता से लेती है। बीबीसी के लिए एक पत्रकार लिखते हैं,"नीतीश कुमार ने सियासी पंडितों को चौंका दिया कि 2019 में नरेंद्र मोदी अपराजेय हैं। धुर मोदी विरोध की राजनीति से मोदी समर्थक राजनेता बने नीतीश का हृदय परिवर्तन एक बार फिर से चर्चा में है।"

                गड़े मुर्दे किसप्रकार उखाड़े जाते है? आज की पीढ़ी शायद भविष्य में कभी न देख पाए! पर हम यह भूल जाते हैं कि राजनीतिक नेता विश्वासपात्र नहीं होते। उनकी अपनी राजनीतिक मजबूरी होती है। आखिर सत्ता पाने की ललक ही तो राजनीतिक पार्टियों को दबाव समूह से अलग करता है। भारतीय फिल्म 'राजनीति' अपने एक संवाद में कहता है कि राजनीति में मुर्दे गाड़े नहीं जाते लेकिन क्या उस राजनीतिक बयान को आज का भारतीय सिविल सोसाइटी अपने जेहन में उतार लिया है?

                 इन दिनों टीवी डिबेट के बहस और अखबारों में छप रहे आलेखों को देखकर लगता है कि गठबंधन टूटने का एक मुख्य वजह को नजरअंदाज कर दिया गया है और वह है - गरिमा का टकराव(conflict of dignity)।

जरा सोचिये!

                 एक ऐसा व्यक्ति जो बिहार की सत्ता पर कई सालों तक काबिज रहा हो और उसे अदालत दोषी ठहरा दिया हो कि आप राजनीतिक रूप से योग्य नहीं है। पर जब वहीं व्यक्ति पूरी ताकत से फिर से उभर कर आता हो तो वह अपनी पुरानी कुर्सी का रौब,कार्य करने का तरीका आदि को क्या कोई भूल सकता है?

                 बिहार में लालू के साथ यहीं हुआ है। भले ही गठबंधन की मजबूरी के चलते प्रारंभिक दिनों में एक कामचलाऊ समझौता हो गया हो पर यह कितना मजबूत था? कोई अंदाजा नहीं लगा सकता जब तक कि नेताओं के मनोवृत्ति को समझने का प्रयास न किया जाए।

                बिहार में दोनों लालू और नीतीश पहले मुख्यमंत्री रह चुके थे। दोनों की कार्यशैली अलग थी। जाहिर सी बात है गैर-जरूरी हस्तक्षेप पूर्व-सरकार में हो रहा होगा जो किसी को भी नामंजूर होगा।

Thursday, 27 July 2017

Political Commentary - भाजपा को बिहार में भी जम्मू-काश्मीर को दोहराना चाहिए!

            सेकुलर जमात को गंभीर दौरा पड़ गया है। आखिर इन्हीं वामपंथी,छद्म उदारवादी और कठमुल्ला जमात द्वारा गढ़ा गया तथाकथित संप्रदायिक भगवा ब्रिगेड अपने थिंक टैंक का उम्दा कमाल जो दिखा दिया है। राजनीति में लंबे-लंबे दावे किसतरह मिटते रहते हैं आज के दिनों में हमसभी एक शानदार अनुभव कर रहे हैं। 'अटूट रिश्ता'(महागठबंधन) कितना क्षणभंगुर था जो उसके मुखिया पर एक आरोप भी सहन नहीं कर पाया और अधोगति को पा गया,हम देख ही चुके हैं।

             इस महागठबंधन में एक से बढ़कर एक नमूने भरे पड़े थे। एक वो जो अध्यादेश को खुलेआम फाड़कर अपनी कद बढ़ाने के जुगत में थे और एक वो जो भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज बुलंद करके राजनीति में आये थे,आज के दिन में भ्रष्टाचार के नए आइकॉन बन गए हैं।

             'भ्रष्टाचार विरोधी छवि वाला व्यक्तित्व,एक भ्रष्टाचारी जिसे अदालत ने दोषी ठहरा दिया है और एक अन्य जो आज तक युवा ही है' का तालमेल बिठा तो लिया गया लेकिन कब तक? युवा युवराज की पार्टी जो अपनी प्रासंगिकता खो चुकी है और आज ढ़लान पर है वो कैसे महागठबंधन को बचा सकती थी जिसे बचाने की जिम्मेदारी दी गई थी।

              जम्मू-काश्मीर की भाँति भाजपा और संघ-परिवार बिहार में भी कमाल दिखा सकती है। जो पीडीपी कभी काश्मीर में पत्थरबाजों से सहानुभूति रखती थी वो आज राष्ट्रवाद का पाठ पढ़ चुकी है और कदम से कदम मिलाकर भाजपाई नीतियों का समर्थन कर रही है। एक ऐसा प्रदेश जो आतंकवाद प्रभावित रहा है और कई तरह की समस्याओं से ग्रस्त है,आखिर जब वहाँ अपने से ठीक विपरीत विचारधारा वाले से गठबंधन कर विचारों पर काबू पा लिया गया तो बिहार में क्यों नहीं हो सकता है?

               राजनीति से परे जाकर संघ परिवार के थिंक टैंक को गंभीरता से सोचना चाहिए कि किसतरह कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर बिहार के नेताओं की सोच को बदला जाए। इनदिनों घटित हो रही घटनाएं समय की कालचक्र की वो नायाब उदाहरण है जिसपर ध्यान केंद्रित करने का ऐतिहासिक अवसर है।

               संघ के जिस आरक्षण की समीक्षा वाले बयान को 2015 के बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान नकार दिया गया था उसे बिहारी जनमानस के मन में नीतीश कुमार के बदौलत डालने का सही वक्त है। इस साध्य को पाने के लिए जी-जान से लग जाना चाहिए क्योंकि आरक्षण अपने लक्ष्य को पा नहीं पाया है। इसने समाज में समरसता लाने के बजाय अलगाव पैदा कर दिया है। जातियाँ मजबूत हो रही है और एक-दूसरे के खून के प्यासे होती जा रही है।

               गौरक्षकों पर किसी भी तरह बिहार की धरती पर होने वाली आलोचना को अंकुश लगाने की जरूरत है। वास्तव में गाय की महत्ता को हम समझ नहीं पा रहे हैं। भारत में यह राष्ट्रवाद को बढ़ावा देती है और एकता-अखंडता की रक्षा करती है।

               तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि राष्ट्रवाद पर किसी भी तरह का समझैता स्वीकार नहीं किया जाए। बिहार के एक देशद्रोही छात्र नेता के समर्थन में नीतीश कुमार द्वारा किये गए बयानबाजी पर माफी मांगने का दबाव बनाया जाए क्योंकि 'भारत तेरे टुकड़े होंगे' जैसे नारे कभी बर्दास्त नहीं किये जा सकते। यह तो वामपंथियों की फितरत है जो इसे 'असहमति का हक' करार दे रहे हैं नीतीश कुमार का नहीं!

Wednesday, 26 July 2017

Political Commentary - राजनीति वाकई संभावनाओं का खेल है?

             "बिहार में लालू और नीतीश के बीच क्या चल रहा है? क्या आपको लगता है कि गठबंधन बच पाएगा?" यहीं सवाल मुझसे इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ मॉस कम्युनिकेशन (IIMC,Delhi) में इंटरव्यू के दौरान पूछा गया था। दिन था-30 जून,2017 का जिससे मात्र कुछ दिन पहले ही जांच एजेंसियों द्वारा लालू के अवैध ठिकानों पर छापा मारा गया था और बिहार की राजनीति में बयानबाजी का बाजार गर्म था।

              उससमय तक मुझे तनिक भी अंदाजा नहीं था कि मात्र 20-25 दिनों में ही राजनीति इसतरह करवट लेगी और सत्ता अपना एक भिन्न रूप दिखाना शुरू कर देगा।

               2015 में हुए बिहार विधान सभा चुनाव के दौरान और उसके तत्काल बाद मैंने कई ब्लॉग लिखे थे जिसे आप यहाँ, यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं। उससमय मैंने साबित किया था कि बिहार चुनाव परिणाम अवसरवादिता और संकीर्ण जातीय सोच की जीत थी। साथ ही यह सवाल उठाया था,"बिहार में यह बदलाव का संकेत है या पुन: जंगलराज की वापसी का?" इतने दिनों तक हुए घटनाक्रमों से सब समझ ही गए होंगे कि बिहार किस तरफ अग्रसर था।

              फिर भी हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि बिहार एक ऐसा प्रदेश रहा है जो शैक्षणिक रुप से पीछे रहने के बाद भी राजनीतिक रुप से सशक्त माना जाता है इसका मुख्य कारण रहा है वहां का सामाजिक पिछड़ापन! पर यह अलग तरह का पिछड़ापन है।

              बुद्ध,महावीर से लेकर चाणक्य,मौर्य सम्राज्य और अशोक सभी ने समाज को रास्ता दिखाने का काम किये हैं। आजादी की लड़ाई में चंपारण से लेकर जेपी का आंदोलन सभी ने देश को रास्ता दिखाने का काम हमेशा किये हैं,पर ये तो अब वक्त बतायेगा कि 2015 के विधान सभा चुनाव परिणाम क्या निर्देश लेकर आयेगा?

               साथ ही इसी ब्लॉग के माध्यम से यह संदेश देने का प्रयास किया था कि अगर नीतीश कुमार राजद पर नियंत्रण कर लेंगे तो वे अपने विकासवादी मॉडल के जरिये बिहार में बदलाव ला पाएंगे। अगर ऐसा नहीं होता है तो तथाकथित 'जंगलराज-2' दोबारा अपना पैर पसारने में कोई गुरेज नहीं करेगा। फलस्वरूप मध्यावधि चुनाव अवश्यंभावी हो जाएगा या बिहार फिर से संक्रमण काल में चला जायेगा। 

               मतलब साफ है कि नीतीश के प्रयास लालू और राजद पर नियंत्रण नहीं कर पाए जिसकी झलक हमें उनके बयान से मिल जाती है जो बुधवार को लालू प्रसाद यादव की प्रेस कॉन्फ्रेंस के कुछ घंटों बाद नीतीश ने यह कहते हुए कि "इस माहौल में काम करना मुमकिन नहीं" और मुख्यमंत्री के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था।

               इसी दौरान इन्होंने कहा था कि मैंने कौन सा प्रयत्न नहीं किया। मैंने नोटबंदी का समर्थन किया। उसके लिए मेरे बारे में क्या-क्या नहीं कहा गया।

               इन्होंने सबसे महत्वपूर्ण बात जो कही वह कि धन-संपत्ति ग़लत तरीक़े से अर्जित करने का कोई मतलब नहीं है। कफ़न में कोई जेब नहीं होती है। कोई लेकर नहीं जाता है। विपक्षी एकता का समर्थक रहा हूं। लेकिन किस बात के लिए विपक्षी एकता। हमारे बारे में क्या-क्या नहीं कहा गया। मैं इन सारी चीज़ों को झेलता रहा हूं। हम इस परिस्थिति में क्या कर सकते हैं। सिर्फ़ प्रतिक्रियावादी एजेंडा से काम नहीं चलने वाला है।

               मैंने अपनी अंतरात्मा की आवाज़ पर इस्तीफा दे दिया। देखा कि कोई रास्ता नहीं है तो नमस्कार किया। लगा कि काम नहीं कर सकते हैं तो ख़ुद को सत्ता से अलग कर लिया। मैंने त्यागपत्र दे दिया है। आगे क्या होगा, कब होगा, कैसा होगा सब भविष्य पर छोड़ दिया जाए।

               पर अब भविष्य सामने आ गया है और भाजपा के समर्थन से नीतीश कुमार छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले चुके हैं।

               वास्तव में यह कोई गठबंधन थी ही नहीं बल्कि एक उम्दा अवसरवादिता थी। एकतरफ ऐसे-ऐसे शख्स थे जो अपने निजी हित की पूर्ति को गठबंधन धर्म समझ बैठे थे और साथ ही जिन्होंने कभी संघ,संविधान और धर्मनिरपेक्षता को अच्छे से समझ नहीं पाया वो सेकुलर संघ बनाकर भारत बचाने निकले थे। हद तो तब हो जाती है जब ऐसे भ्रष्टाचारियों का लोग समर्थन करते हैं और चुनावी पर्व में वोट देने की गलती कर बैठते हैं। आखिर इतिहास और अतीत किसलिए होती है कि हम सिख ही नहीं पाए। जिस लालू ने पूरे बिहार को गर्त बना दिया वहीं लालू जब दोबारा सत्ता में आते हैं तो बिहारी जनता की समझ पर सवाल उठाना लाजिमी हो जाता कि कैसे लालू के अनपढ़ बेटों की जिंदगी बनाने के लिए अपने बेटों की जिंदगी दांव पर लगा देते हैं?

                परंतु अब देखना काफी महत्वपूर्ण हो गया है कि भाजपा के सहयोग से नीतीश के सत्ता में आने से उनके रुख में क्या परिवर्तन होता है?

                 क्या वे गौरक्षकों का समर्थन करेंगे? क्या वे आरक्षण पर संघ के समीक्षा वाले बयान के पक्ष में खड़े होंगे? साथ ही क्या वे देशभक्ति को बिहार में बढ़ावा देंगे और भाजपा का सहयोग करेंगे? और हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि क्या वे JNU के एक देशद्रोही छात्रनेता जिसका ताल्लुक बिहार से ही है का अब भी समर्थन करेंगे या जम्मू-काश्मीर में पीडीपी की भांति भाजपा राष्ट्रवाद पर नीतीश को प्रभावित कर पाएगी?

History - महान किसे कहा जाए?

              इतिहासकार डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल(पूर्व प्राध्यापक, इतिहास विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय) शानदार सवाल उठाते हैं। आखिर महान कहलाने की कसौटी क्या है? इनका कहना है,"किसी शासक का मूल्यांकन उसके द्वारा राष्ट्रजीवन के विकास में किये गये प्रयत्नों के रूप में आंका जाना चाहिए। उसकी मातृभूमि, भक्ति तथा सांस्कृतिक जीवन मूल्यों की स्थापना में उसके योगदान से की जानी चाहिए। उसके धर्म संरक्षण तथा जनकल्याण के कार्यों से आंकी जाना चाहिए।"

              अत: सम्राट अकबर तथा महाराणा प्रताप का तुलनात्मक अध्ययन आवश्यक होगा। ऐसे भी तब जब इतिहास लेखन का नया दौर चल रहा हो। राजस्थान बोर्ड की 10वीं क्लास की किताब के मुताबिक,''हल्दीघाटी की लड़ाई में अकबर ने महाराणा प्रताप को हराया था।''

इससे पहले कुछ वामपंथी इतिहासकारों के वक्तव्य को देख लेना जरूरी होगा।

                भारतीय कम्युनिस्ट लेखकों ने मुगल साम्राज्य को भारत का शानदार युग तथा मुगल शासकों को महान मुगल कहा है (विपिन चन्द्र- मॉडर्न इण्डिया, पृ. 11) इससे भी एक कदम और बढ़कर इसे भारत में स्थापित राष्ट्रीय राज्य अथवा भारतीय राष्ट्रवाद की तुलना में राष्ट्रीय शासक थे (रोमिला थापर, हरवंस मुखिया तथा विपिन चन्द्र, कम्युनलिज्म एण्ड द राइटिंग्स आफ इंडियन हिस्ट्री, पृ. 58-60)।

                 भारतीय कम्युनिस्ट लेखकों तथा तथाकथित सेकुलरवादियों ने महाराण प्रताप को केवल दिल्ली सम्राट के संदर्भ में ही देखने का प्रयत्न किया या मेवाड़ के राजाओं की श्रृंखला की एक कड़ी माना। उन्होंने राणा प्रताप का प्रभाव सीमित श्रेत्र तक ही बतलाया।

                  वस्तुत: मुगल शासक की तुलना करते हुए, महाराणा प्रताप से श्रेष्ठ इसे बतलाते हुए, एक झूठे प्रचारतंत्र तथा राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप अवसरवादिता ही कहा जा सकता है, परन्तु इतिहास के पाठकों को इस प्रचार के प्रमाण रहित तथ्यों के आधार पर ज्यादा देर तक भ्रमित नहीं किया जा सकता।

                  हद तो तब हो गई जब कांग्रेस सरकार के काल में प्रकाशित कक्षा छह से कक्षा बारह तक की सभी इतिहास की पुस्तकों में एनसीईआरटी द्वारा महाराणा प्रताप को इतिहास से निष्कासित कर दिया गया। उसका नाम भी इतिहास की पुस्तकों में नहीं है। साथ ही श्याम नारायण पाण्डे की पुस्तक हल्दीघाटी के पदों को पुस्तको से निकाल दिया गया। ऐसी क्षुद्र मानसिकता क्या कभी किसी देश में अपने देश के वीरों के संदर्भ में मिलेगी? कदापि नहीं।

अकबर महान कैसे?

                 वास्तव में अकबर का प्रवृत्ति साम्राज्यवादी था। सम्राट अकबर मुगल वंश का तीसरा शासक था जिसने 1956-1605 ई. तक अर्थात लगभग पचास वर्ष राज्य किया था। पहले दो शासकों की भांति वह भी विदेशी था। उसकी रगों में भारतीय रक्त की एक बूंद भी न थी (वी.ए. स्मिथ, अकबर द ग्रेट मुगल, पृ.1) वह अफीम मिली शराब का व्यसनी था।

                  नशे में इतना धुत हो जाता था कि मेहमान से बातें करते-करते सो जाता था (विवियन, अकबर पृ.16) उसमें महिला विषयक सभी बातें थीं। अबुल फजल के अनुसार उसके हरम में 3000 महिलाएं थीं (अबुल फजल, अकबरनामा) सम्राट अकबर का जीवन-दर्शन तथा दैनिक क्रियाकलाप एक विदेशी साम्राज्यवादी तथा कट्टर मुसलमान के समान थे।

महान महाराणा प्रताप और उनका चरित्र

                   उन्हें मिला मेवाड़ राज्य के नाम पर केवल 450 वर्ग किमी. परिधि वाला छोटा सा पर्वतीय भूभाग, प्राचीन मेवाड़ की गौरवमयी कुल परंपरा तथा 1568 में अकबर द्वारा चित्तौड़ का ध्वंस, जौहर तथा तीस हजार राजपूतों के नरसंहार की स्मृतियां।

                   उसके सम्मुख दो विकल्प थे- साम्राज्यवादी क्रूर तथा चालाक सम्राट अकबर की अधीनता अथवा भारत की स्वाधीनता के लिए विदेशी अकबर से अनवरत संघर्ष। प्रताप ने दूसरा मार्ग चुना।

                    नि:संदेह महारणा प्रताप ने अकबर के विरुद्ध अपनी स्वाधीनता की रक्षार्थ आजीवन संघर्ष ने भारत के राष्ट्रीय चरित्र को शक्ति तथा उच्चता प्रदान की। प्रसिद्ध इतिहासकार डॉ. आशीर्वादी लाल श्रीवास्तव ने लिखा प्रताप के अकबर महान के विरुद्ध सफल संघर्ष के कारण भारतवर्ष की प्रधान तात्विक भावना का प्रतीक माना गया है जो सर्वथा उचित है। यह भावना देश के परंपरागत गौरव की रक्षा करती है और इस गौरव पर आंच लाने वाली हर बात के विरुद्ध संघर्ष करती है।

प्रताप से प्रेरणा

                     संकट की बेला में महाराणा प्रताप ने अद्भुत धैर्य, क्षमता तथा शौर्य का परिचय दिया। उन्होंने भीलों तथा अन्य जनजातियों को समरसता, सहयोग से संगठित कर उन्हें राष्ट्र की मुख्यधारा से जोड़ दिया, जो आज भी राष्ट्रीय कर्णधारों के लिए बेजोड़ मिसाल है।

                      सम्राट अकबर ने अपने स्वभाव के विपरीत महाराणा प्रताप पर तुरंत आक्रमण नहीं किया। पहले उसने मेवाड़ के चारों ओर के क्षेत्रों पर महाराणा प्रताप के संबंधियों को शासक बनाया, जो महाराणा के विरुद्ध थे। मेवाड़ के आसपास मुसलमानों को बसाया। एक-एक करके चार बार अकबर ने अपने दूत प्रताप को अधीनता स्वीकार करने को भेजे, पर सभी असफल रहे।

                      आखिर मानसिंह को प्रताप के विरुद्ध भेजा। राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. के.एस. गुप्ता ने इसका विस्तृत वर्णन किया। मुख्य युद्ध खमनौर के पास रक्त तिलाई में हुआ (यहां स्मृति के रूप में एक विशाल सरोवर बना हुआ है) हल्दीघाटी में भयंकर मारकाट हुई। अबुल फजल ने लिखा, युद्ध में इज्जत महंगी और जान सस्ती थी। युद्ध में महाराणा प्रताप को भारी सफलता मिली तथा मुगल सेना को भागना पड़ा। हल्दीघाटी का यह युद्ध भारत के इतिहास की अमर गाथा है।

हल्दीघाटी का युद्ध और दोबारा इतिहास लेखन!

                    इसी युद्ध के संबंध में पीटीआई के अनुसार सोशल साइंस की एक नई किताब को 2017-18 में राजस्थानी छात्रों के पाठ्यक्रम में शामिल किया गया है। इस किताब के इस चैप्टर को लिखने वाले चंद्रशेखर शर्मा का दावा है कि ऐसे कई तथ्य हैं जो इस ओर इशारा करते हैं कि लड़ाई के नतीजे महाराणा प्रताप, मेवाड़ के राजपूत राजा के पक्ष में रहे।

शर्मा का दावा कि विजेता राणा प्रताप हैं।

                  शर्मा इन दावों के बारे में कहते हैं, ''ये ऐसे परिदृश्य हैं जो हल्दीघाटी युद्ध के परिणाम प्रताप के पक्ष में लाकर खड़ा कर देते हैं। इनके अनुसार अकबर का लक्ष्य था कि महाराणा प्रताप को पकड़ा जाए और मुगल दरबार में पेश किया जाए या मार दिया जाए। इसका मकसद राजपूत राजा के साम्राज्य को मुगलों के अंतर्गत लाना था। लेकिन अकबर अपने किसी मंसूबे में कामयाब नहीं हो पाया।

                  ऐसे ऐतिहासिक सबूत हैं कि मुगल सेनाएं मेवाड़ को फ़तह करने में नाकामयाब रहीं और लड़ाई महाराणा प्रताप के पक्ष में रही।''

महाराणा प्रताप प्रेरणा के स्त्रोत न कि अकबर।

                   भारत के इतिहास में महाराणा प्रताप सदैव प्रेरक रहे, अकबर नहीं। वस्तुत: अंग्रेजों के काल में दासता से मुक्ति दिलाने में प्रताप के नाम ने जादू का काम किया था (डॉ. के.एस. गुप्ता, साम्राज्यवाद के विरुद्ध स्वतंत्रता का पथ प्रदर्शक मेवाड़) क्रांतिकारी शचीन्द्र सान्याल की अभिनव भारत समिति की सदस्यता के लिए चित्तौड़ जाकर विजय स्तंभ के नीचे शपथ लेने की पहली शर्त थी। सदस्य बनने के पश्चात चितौड़ तीर्थ की यात्रा तथा हल्दी घाटी की माटी का तिलक आवश्यक था।

                    श्यामनारायण पाण्डे ने अपनी प्रसिद्ध काव्य हल्दीघाटी (1949) में प्रताप को भारत का गौरव लिखा। गणेश शंकर विद्यार्थी प्रताप को अपने इष्टदेव के रूप में मानते थे। 9 नवम्बर 1913 को उन्होंने अपनी साप्ताहिक पत्रिका प्रताप को समर्पित करते, पहले अंक में लिखा- संसार के किसी भी देश में तू (राणा प्रताप) होता तो तेरी पूजा होती और तेरे नाम पर लोग अपने को न्योछावर करते।

                     अमरीका में होता तो वाशिंगटन या नेल्सन को तेरे आगे झुकना पड़ता। फ्रांस में जॉन ऑफ आर्क तेरी टक्कर में गिनी जाती और इटली तुझे मैजिनी के मुकाबले रखती।' हल्दीघाटी के पश्चात सम्राट अकबर की महाराणा प्रताप से लड़ने की हिम्मत न हुई। इतिहास का कोई भी पाठक स्वयं निर्णय कर सकता है कि क्या भारत की महानता, महाराणा प्रताप की स्वाभिमानपूर्ण तथा राष्ट्रीय भावना से ओतप्रोत स्वराज्य के लिए संघर्ष में थी या साम्राज्यवादी, विदेशी, मतान्ध तथा महत्वाकांक्षी अकबर की कूटनीति में। वस्तुत: सम्राट अकबर के साथ महान शब्द जोड़ना सर्वथा अनुचित तथा तथ्यहीन है। नि:संदेह 'महान' महाराणा प्रताप का जीवन भावी पीढ़ी के लिए सतत् प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा।     

पूर्वाग्रहग्रस्त मीडिया की नजर! किस तरह गुमराह किया जा रहा है।

               बीबीसी महाराणा प्रताप की जीत के संबंध में लिखता है,"441 साल बाद महाराणा प्रताप से हारे अकबर!-राजस्थान में इतिहास 360 डिग्री पर घूमता सा नज़र आ रहा है।"

              वहीं इंडियन एक्सप्रेस लिखता है,"Maharana Pratap won Haldighati: varsity accepts MLA proposal."

               इंडिया टुडे का कहना है," Rajasthan rewrites history: Maharana Pratap, not Akbar, won Battle of Haldighati."

                हिंदुस्तान टाइम्स तो एक कदम और आगे बढ़ जाता है,"BJP-ruled states are facing increasing criticism for allegedly re-writing history of India to give it a right-wing perspective: portray Mughals ruler as mass murderers and show Hindu rulers as the victors in major battles. The party is also accused of erasing references of its political adversaries to include people whom it considers national icons."

पर कभी आपने सोचा है कि इसतरह की बातें क्यों की जाती है? और ऐसी रिपोर्टिंग क्यों होने लगती है?

                यदि संघ से संबंध रखने वाला कोई व्यक्ति है तो उसे सांप्रदायिकता का प्रमाण पत्र दे दिया जाता है,लेकिन जब कई विद्वानों और इतिहासकारों का संबंध किसी वामपंथी संगठन से हो तो इनका कौमार्य भंग नहीं होता। अजीब विडंबना है देश का। कभी आप भी सोचिए!

                वास्तव में वामपंथी जमात एक कल्पित आत्ममुग्ध भाई-भतीजावादी समूह है। अगर दिल्ली में बैठा कोई वामपंथी कुछ दावा करता है तो केरल और बंगाल के तथाकथित वामपंथी भाई बिना अध्ययन और प्रमाण जुटाए हाँ में हाँ मिलाना शुरू कर देते हैं। इनको अकादमिक दुनिया और शोध से कोई लेना-देना नहीं है बल्कि ये अपनी एजेंडा को हमेशा फैलाने को प्रयासशील रहते हैं। यह एजेंडा है मुस्लिम तुष्टिकरण का,दलित सहयोग के नाम पर सवर्णों के खिलाफ भड़काना,नारी सशक्तिकरण के नाम पर भारतीय फ्री सेक्स को बढ़ावा देना और भारतीय संस्कृति को पतनोन्मुख बनाना ताकि समाजवादी राज्य की स्थापना कर स्टालिन की भांति लाखों मासूम लोगों की हत्या किया जा सके और अपने आराम की कुर्सी पाकर शैंपेन की बोतल आपस में लड़ाकर कहते रहे हैं कि भारत में असहिष्णुता बढ़ गया है,आपातकाल की आहट सुनाई दे रही है,संविधान खतरे में है...वगैरह....वगैरह....!

आलेख का आधार-

1. इतिहासकार डॉ. सतीशचन्द्र मित्तल(पूर्व प्राध्यापक, इतिहास विभाग, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय) की किताबें
2. विपिन चंद्र और रोमिला थापर की किताब(संदर्भ आलेख में है)
3. पांचजन्य में छपा आलेख
4. बीबीसी हिंदी
5. इंडियन एक्सप्रेस
6. इंडिया टुडे
7.हिंदुस्तान टाइम्स
8. ब्लॉग