Wednesday, 2 August 2017

जन चर्चा में आज बेबाक नजरिया : वर्तमान सामाजिक विमर्श का स्तर -10/2

           क्या बात है? 'घर वापसी' हो गई है! सरकार तो बन गयी है। भाजपा की झोली में एक और राज्य आ गया है। धूर विरोधी नीतीश कुमार घुटने टेक दिए हैं जिसकी पुष्टि उनके बयान 'मोदी का कोई तोड़ नहीं' से हो गई है। अब तो भविष्य ही बताएगा कि नीतीश का दोबारा पलटी मारने का वक्त कब आएगा?

           विश्लेषक अपने-अपने तरीके से विश्लेषण कर लिए हैं। तिल का ताड़ बना दिया गया है। सुंदर कपड़े की जगह फटे हुए बनियान की चर्चा हो चुकी है। मक्खियाँ खुबसूरत चेहरे को छोड़ घाव पर बैठने की चेष्टा में है और यह काम हमारे समाज के राजनीतिक विश्लेषक और बुद्धिजीवी भली भांति कर रहे हैं।

            पर हम परेशान हैं। विकास का पर्यायवाची चमकदार सड़कें और हवा में झूलती ओवरब्रिज हो चुका है। राजनीतिक बयान जन-विमर्श का विषय बनते जा रहा है,आखिर शिक्षा और स्वास्थ्य पर चर्चा का वक्त किसे है? पर्यावरण तो दूर की कौड़ी है। इतिहास हमसे अछूता ही है और राष्ट्रवाद की बात कौन करे?

            आज लगता है राष्ट्र पर भाजपा का पेटेंट हो गया है। देश की बात करने वाला पल भर में भाजपाई हो जाते हैं। सैनिकों का बात करने पर तो डर लगता है कब कोई सवाल कर दे कि संघ को इसका ठिका किसने दे रखा है?

             एक विश्वविद्यालय में टैंक लगाने के सवाल पर तो बातें सीटों में कटौती की की जाने लगी। राष्ट्रवाद पर बहस न जाने कब शिक्षा और स्वास्थ्य में तब्दील हो जाता है कोई नहीं जानता। जाने भी कैसे? राजनीतिक नेता जो बुद्धिजीवियों और विद्वानों पर हावी होते जा रहे हैं?

            ताज्जुब तब हो रहा है जब पत्रकार अपने को विद्वान समझने लगे हैं और लगभग सारे विषयों पर विशेषज्ञ के हैसियत से लिखने लगे हैं। ऐसी स्थिति में समाज कहाँ जाएगा?

             मीडिया का हाल तो भीगे गिद्ध का हो गया है। क्षण भर में कोई सेकुलरिज्म का मुख्य झंडाबरदार और कुछ पल बाद ही संप्रदायिक हो जा रहा है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री का उम्मीदवारी मिलने के साथ ही तथाकथित संप्रदायिक आडवाणी सेकुलर हो जाते हैं और वे मोदी पर एक अच्छा विकल्प नजर आने लगते हैं। पर क्या करें भाई लोग इसी कारण तो आपको कोई सीरियसली नहीं ले रहा है!

             भले ही समाज और राजनीति का जुड़ाव इस कदर है कि वे एक ही सिक्के के दो पहलू नजर आते हैं लेकिन क्या राजनीति सभी पर हावी हो सकती है? आप भी सोचिये और जरूर सोचिये!